‘एक और गंधहीन फूल।’ मीनल ने गमले में मुरझा चुके नाइन-ओ-क्लॉक के एकमात्र फूल को देख कर सोचा। हेमंत देखेंगे तो बहुत झल्लाएंगे, ‘तुमने तो कहा था कि अब गंधहीन फूल नहीं लगाओगी। फिर क्यों लगाया?’ क्या उत्तर दूंगी तब! क्या कह सकूंगी कि यह फूल मैंने इसलिए लगाया कि मुझे अपनी और इसकी स्थिति एक जैसी लगती है। जिस तरह इसमें कोई गंध नहीं और इसका गमले में खिलने के सिवा और कोई उपयोग नहीं, न किसी देवता पर चढ़ना न किसी गुलदस्ते में लगना, उसी तरह मेरा भी कोई उपयोग नहीं। न किसी की कोई भावना मेरे लिए न ही मेरा कोई अधिकार किसी पे। लेकिन जिस तरह यह नौ बजे सूरज को देख कर खिलता है न उसी तरह मैं भी…। काश! मैं यह कह पाती। इस पौधे की मूकता में अपने हृदय की जिस भावना को मुखरित करने की चेष्टा की है, क्या आप उसे समझ सकेंगे हेमंत? क्योंकि यह तो जमीन का अदना-सा पौधा है जो कभी सूरज तक नहीं पहुंच सकता और सूरज अपनी ऊंचाई छोड़ नीचे झुकना कभी पसंद नहीं करेगा। मीनल ने एक लंबी सांस ली और झुक कर नाइन-ओ-क्लॉक के गमले को उठा कर गेट के पास रखे गमलों के बीच रख दिया। ‘क्या वे इसे देखेंगे? और देखेंगे भी तो क्या इसमें निहित मेरी भावना समझेंगे? समझेंगे कैसे! ढेर सारे फूलों के बीच यह भी एक है। कोई ऐसी विशेषता भी नहीं कि इस पर पल के लिए दृष्टि ठहर जाए। वो यहां आते हैं वर्षों के अभ्यास के कारण। अब उन्हें इतनी छोटी-सी चीज देखने की फुरसत कहां।’ उदासी घनी होने लगी थी। वह मन बांटने के लिए गेट की तरफ बढ़ गई। सामने दूर तक फैली सूनी सड़क थी। ‘कितनी भाग्यहीन है यह सड़क।’ मीनल फिर सोचने लगी। ‘लोग इस पर चलते हैं कहीं जाने के लिए। इसे माध्यम बनाते हैं अपना गंतव्य पाने के लिए। लेकिन कोई इसके लिए नहीं आता | सड़क का सूनापन उसके ऊपर छाने लगा। उससे मुक्ति का कोई उपाय नहीं था। उसने गेट पर सर टेक दिया। एक परिचित कार के हार्न ने उसे चौंकाया। चहरे के विषाद को आंचल से पोंछ कर स्वस्थ होने की चेष्टा कर ही रही थी कि हेमंत की कार आ पहुंची।
- “हैलो मिली। क्या कर रही हो यहां पर?” हेमंत ने कार लॉक करते हुए पूछा।
- “प्रतीक्षा।” उसने मुस्कुरा कर कहा और गेट खोल कर एक तरफ खड़ी हो गई।
-“ प्रतीक्षा करने का यह कोइ नया ढंग है क्या? इस तरह गेट पर सर टेक कर?”
-“ प्रतीक्षा जब देर तक करनी पड़ी तो सजदा करने लगी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा।
- “अच्छा! जरा उस भाग्यवान का नाम तो बताओ जिसके लिए तुम्हें सजदा करने की जरूरत पड़ने लगी।” हेमंत ने आश्चर्य की मुद्रा बनाई।
- “रहने दीजिए। क्या करेंगे जान कर?” मीनल ने कहा और अनायास ही उसकी दृष्टि नाइन-ओ-क्लॉक पर चली गई। हेमंत ने उसकी दृष्टि का अनुसरण किया और बोल उठे – ‘“अब ये कौन-सा फूल उठा लाई? तुमने तो कहा था कि अब कोई गंधहीन फूल नहीं लगाओगी। क्या नाम है इसका?”’
- “नाइन-ओ-क्लॉक।” उसने धीरे से कहा और उनके चहरे को देखा | वहां कुछ नहीं था।
- “ओ! यही है नाइन-ओ-क्लॉक! हत तेरे की। वो उसी तरह बोलते जा रहे थे।
- “क्यों?”
-“ अरे मैं सोचता था कि यह कोई बहुत सुन्दर फूल होगा।- “तो कोई बदसूरत भी नहीं है।” मीनल ने प्रतिवाद किया |-“ अरे बदसूरत नहीं तो खूबसूरत भी तो नहीं है। एक तो ऐसे ही गंधहीन फूल, उस पर से सुन्दर भी नहीं तो फिर क्या फायदा? ऐसे फूल सिर्फ मजबूरी में ही काम आते हैं।
- “ठीक मेरी तरह। है न?” मीनल के होंठ तीखी लेकिन विषाद भरी मुस्कान में तिरछे हो गए।
-“ हैं?” हेमंत की भवों में बल पड़ गए।
- “हां। मुझे भी तो सब तभी याद करते हैं जब कोई विवशता होती है। ऐसे तो मुझे भी कोई याद नहीं करता। कितना साम्य है। है न?” मीनल की आवाज़ रुंधने लगी थी। पता नहीं हेमंत ने इसे महसूस किया या नहीं।
- “बस! उलटने लगी तुम्हारी खोपड़ी?” उन्होंने अपना चिरपरिचित जुमला दुहराया।
-“ अब क्या नए सिरे से उलटेगी।” मीनल ने हंस कर कहा और आगे बढ़ गई। वे दोनों ड्राइंग रूम आ गए। हेमंत ने बड़े सोफे को पकड़ा और अधलेटे हो गए।
- “लगता है सब घर में नहीं है, वरना अब तक तो बिल्टू लाल मुझ तक पहुंच चुके होते। कहां गए हैं सब?” उन्होंने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।
- “भइया की ससुराल में कोई शादी है, उसी में।”
- “तुम अकेली हो?”
-“ थी।” मीनल ने सुधारा।
- “अरे तुम्हारा क्या ठिकाना। तुम तो भीड़ में भी अकेली रहने वाली हो।”
- “हूं। अकेली तो मैं हमेशा रहती हूं, बस केव…।” वह बीच में ही चुप हो गई।
- “चुप क्यों हो गई? वैसे मैं समझ गया।”
- “अरे छोड़िए! आप कुछ नहीं समझते।” उसने हेमंत को चिढ़ाने के लिए कहा। उसे पता था उन्हें ऐसी बातें सहने की आदत नहीं थी। वो सर ऊंचा कर ढेर सारा धुआं उगलते हुए बोले - “देखो मिली, मैं तुम्हें तब से जानता हूं जब तुम फ्रॉक पहना करती थी। मैंने तुम्हें सलवार कुरते में भी देखा और अब साड़ी में भी देख रहा हूं। मेरे सामने तुम स्कूल से निकली, कॉलेज ग़ई और अब नौकरी कर रही हो। आठ-नौ सालों की लंबी अवधि काफी होती है किसी को समझने के लिए। समझी? तुम किस समय…।”
-“ नहीं।” मीनल ने उन्हें बीच में रोक दिया। “इतने सालों में मैंने भी तो आपको देखा है, लेकिन मैं अभी भी नहीं कह सकती कि मैं कितना समझ सकी हूं। वैसे मैं जानती हूं आप कहेंगे कि यह तो अपनी-अपनी क्षमता है। है न?”
- “अब ऐसी स्थिति में तो यही कहना पड़ेगा।” वे उसी तरह धुआं उड़ाते हुए बोले। वह एक व्यंग्यात्मक हंसी हंस कर चुप रही। उसकी बड़ी इच्छा हो रही थी कि कहे ‘आप सच में ही मुझे नहीं समझते। अगर समझते तो मैं क्यों वह नाइन-ओ-क्लॉक लगाती’। उसने एक लम्बी सांस से अपने मन में घुमड़ रही भावनाओं को निकाल दिया और खड़ी हो गई।
-“ कहां जा रही हो?” हेमंत ने पूछा।
- “कहीं नहीं। अन्धेरा हो गया, लाइट जला दूं।”
- “अरे हां, अन्धेरा हो गया। कब तक लौटेंगे वो लोग?”
-“ नहीं मालूम।”
- “तुम्हें मालूम क्या रहता है यही बताओ।” हेमंत ने चिढ़ कर कहा।
- “यह भी नहीं मालूम।” मीनल ने हंस कर कहा और लाइट जला कर हेमंत के पैरों पास सोफे के नीचे बिछे गलीचे पर बैठ गई।
- “यह भी नहीं मालूम।” हेमंत ने नाराजगी से दुहराया। “बिल्टू तो लौटेगा न? उसे तो तुम्हारे बिना नींद ही नहीं आती।” मीनल हंस पड़ी।
- “कब की बात कर रहे हैं आप? ज़माना हो गया इन बातों का। अब किसी को मेरी कोई जरूरत नहीं रही।”
- “तुम्हारी जरूरत किसी को नहीं रही, यह कब से हुआ?”
-“ जब से मैं इस नौकरी में आई तब से।” हेमंत ने न समझ आने वाले अंदाज में उसे देखा |
- “आश्चर्य है आप इसे कैसे नहीं जानते। कितने दिनों पे आ रहे हैं आप? या सबों ने मेरे विषय में बातें करनी भी बंद कर दी हैं।” मीनल एकबार फिर हंस पड़ी। सूखी, उदास हंसी।
- “आया तो हूं मैं। अभी भी महीने में एक-दो बार तो आ ही जाता हूं। अभी पिछले ही महीने तो आरती और मैं दोनों ही आए थे। महेश भी आता है, भाभी के साथ भी आया है लेकिन उनकी बात से कभी ऐसा तो कुछ नहीं लगा मुझे।” हेमंत ने थोड़े विस्मय से कहा।
-“ शायद इसमें कुछ कहने जैसा कुछ है भी नहीं। बस महसूस किया जा सकता है और वो मैं कर रही हूं।”
- “क्या हुआ? कुछ बताओगी भी।” हेमंत के स्वर में चिंता थी। मीनल थोड़ी देर सर झुकाए गलीचे में निकले धागे को खींचती रही जैसे बोलने के साहस जुटा रही हो या शब्द ढूंढ़ रही हो।
- “आपको याद होगा महंगी कोचिंग और दिन-दिन भर की पढ़ाई कर के भी भइया तीन बार की कोशिश में भी आई.ए.एस. नहीं निकाल पाए। आपने उनकी निराशा देखी थी और पापा की भी क्योंकि ये वो सपना था जो पापा ने अपने लिए देखा था और जो क्षमता होते हुए भी परिस्थितियों के कारण पूरा नहीं हो सका था। उन्होंने मैं न सही मेरा बेटा सही की भावना से भइया के लिए वो सारी सुविधाएं जुटाईं जो भी उनके आई.ए.एस. बनाने में सहायक होतीं। लेकिन यह हो नहीं पाया। उन दोनों की निराशा देख कर मैंने सोचा कि मैं बनूंगी आई.ए.एस.। पापा और भइया दोनों के सपनों को पूरा करूंगी। उस वक्त आपके सिवा और किसी ने मेरा यकीन नहीं किया था। ठीक भी था। किसी तरह खींच-खाँच कर 60 परसेंट लाने वाली लड़की का यकीन किया भी नहीं जा सकता था। पापा ने तो सीधे कह दिया था कि जब महेश नहीं कर सका तो तुम क्या कर लोगी! मेरा भी खुद पे कोई बहुत भरोसा नहीं था सो मैंने पैसों की बरबादी के डर से कोई मदद नहीं मांगी थी। आपको याद है न आपने कुछ नए नोट्स जुटाए थे और शेष तो भइया के पुराने नोट्स और किताबों से ही तैयारी की थी मैंने। यह भी सच है कि भइया ने थोड़ा गाइड भी किया था मुझे। मेरे कंपीट कर जाने पर शुरू में सब खुश भी हुए थे। फिर न जाने क्यों सारी खुशी पर धीरे-धीरे एक कालिख-सी छाती चली गयी। कितना प्यार करते थे भइया मुझसे! भाभी के आने के बाद भी मेरे लिए उनका प्यार जरा भी कम नहीं हुआ था। लेकिन अब तो दो-दो तीन-तीन दिन हो जाते हैं उनसे बात हुए हुए। उनका फ्रश्टेशन समझ में आता है। उनका बेस्ट फ्रेंड एक काबिल डॉक्टर बन गया, छोटी बहन ने वह नौकरी पा ली जिसकी तमन्ना उन्होंने की थी। लेकिन पापा? वो क्यों? शायद मैं बेटी हूं इसलिए।”
हेमंत ने सिगरेट की डिब्बी को घुमाना रोक कर उसे देखा।
- “यह क्या कह रही हो मिली?” उनके स्वर में अविश्वास था। “मैंने उन्हें बहुत खुश देखा था।”
- “हां आपने उन्हें खुश देखा था। वो खुश थे भी। लेकिन यह खुशी वैसी नहीं थी जैसी कि मैंने आशा की थी। एक कसक थी उसमें। यह वह खुशी नहीं थी जो फूट कर निकलती है। यह एक संयमित खुशी थी। उन्हें आई.ए.एस. पुत्र का पिता कहलाना ज्यादा अच्छा लगता। बेटी तो ब्याह कर दूसरे घर चली जाएगी न।” मीनल ने स्थिति स्पष्ट की।
- “यह तुम कैसे कह सकती हो?” हेमंत ने मीनल को थोड़ी तीव्र दृष्टि से देखा। मीनल के मुंह से एक लम्बी सांस निकल गई।
- “जाहिर है इसे महसूस किया है तभी कह रही हूं। मीनल ने उदास स्वर में कहा। “जब मेरी पोस्टिंग इसी शहर में हो गई थी तो मैं बहुत खुश हुई थी कि बड़े बंगले में रहेंगे, अर्दली, माली, कुक, मतलब कि वो सारी सुविधाएं मिलेंगी। सबको आराम हो जाएगा, शान रहेगी सो अलग। लेकिन आपको याद होगा कि पापा ने यह कह कर कि जब अपना घर है ही तो किसलिए बंगला लेना, मना कर दिया था। आपने भी कहा था इस उम्र में अपना घर छोड़ कर रहना नहीं ही अच्छा लगेगा उन्हें। मैंने भी मान लिया था लेकिन आपने शायद ध्यान नहीं दिया कि धीरे-धीरे मैंने बाकी सारी सुविधाएं भी लौटा दीं।
- “अरे हां! मैं पूछने ही वाला था तुमसे। मैंने महेश से भी पूछा था तो उसने कहा कि यह तो मीनू ही जाने। क्यों लौटा दिया तुमने?” हेमंत ने चौंकते हुए पूछा।
- “अब भी पूछना बाकी है आपको?” मीनल ने थोड़े शिकायतिया लहजे में कहा। सुन कर हेमंत ने उसकी आंखों में देखा और कुछ बोलने को हो कर रुक गए। “कोई भी उन सुविधाओं को लेने के लिए तैयार नहीं था। अर्दली बैठे रहते और भइया उसी तरह ऑफिस से लौटते हुए सब्जी ले कर लौटते। कुक यूं ही रसोई में खड़ा रहता और भाभी ‘तुम छोड़ो। यहां के लोगों की पसंद के अनुसार तुम खाना नहीं बना पाओगे’ कह कर खुद ही बनाती रहतीं। जबकी इसके पहले उन्हें खाना बनाने के काम हमेशा ही भारी लगता रहा था।” मीनल ने स्पष्ट किया। “शुरुआत में मुझे लगा था कि ऐसा अभ्यासवश कर रहे हैं सब। लेकिन फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि यह अभ्यास नहीं था, यह तो जिद थी। सब लौटा दिया मैंने। किसलिए उन्हें तकलीफ़ हो!” मीनल की आवाज बहुत धीमी हो गई थी। जैसे बोलने में कष्ट हो रहा हो। “आपने एक-दो बार पूछा था कि घर क्या सिर्फ सोने के लिए लौटती हो? हां, मैं घर नहीं लौटना चाहती। किसके लिए लौटूं? किसी को मेरे लौटने की प्रतीक्षा नहीं होती। भारी हो जाता है घर का वातावरण मेरे आ जाने से। कितनी बार देखा है खाने की मेज पे सभी हंस-बोल रहे होते हैं, मेरे आते ही बातें धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं। मां एक-दो बात कुछ बोल लेती है मुझसे। लेकिन शायद वो डरती है कि बेटा-बहु को बुरा न लग जाए। कितनी पीड़ा होती है मुझे, आपने सोचा है कभी? मैं जानती हूं नहीं सोचा है। मुझे आश्चर्य होता था कि आपको कैसे नहीं दिख रहा है यह सब। बहुत बार सोचा कि कहूं आपसे। शायद आप समझा सकें सबको कि मुझे कितना दुःख हो रहा है। लेकिन जानती थी कि कोई फायदा नहीं क्योंकि आपने तो हमेशा फ्रॉक पहनने वाली मीनल-सा ट्रीट किया है। आपके लिए तो मीनल कभी बड़ी ही नहीं हुई। उसकी तो हर इच्छा, हर अपेक्षा हमेशा बचपना ही रही है आपके लिए। कितने आश्चर्य की बात है कि आपने हमेशा मेरी हर इच्छा पूरी की, जो खुद नहीं कर सकते थे उसे पूरा करने का माध्यम बनते रहे। लेकिन इस बार आपने भी इसे समझने से इनकार कर दिया। ठीक उसी तरह जैसे आपने मीनल की चाहत को भी समझने से इनकार कर दिया।” हेमंत ने झटके से सर घुमा कर उसे देखा और एकदम उठ कर बैठ गए। वो कुछ हतप्रभ से, कुछ नाराज से उसकी आंखों में देख रहे थे। मीनल ने घबरा कर पलकें झुका लीं।
- “क्या कहा तुमने?” उनकी गंभीर आवाज कुछ और गंभीर हो गई थी। मीनल ने होंठ काट लिए। उसने तो सोचा था उन्हें कभी नहीं कहेगी कि वो उन्हें…। लेकिन शायद उसकी सहनशीलता की सीमा समाप्त हो गई थी।
- “तुम क्या बोल गई मिली, तुम्हें पता है?” हेमंत ने उसे चुप देख कर कहा। मीनल से कोइ उत्तर नहीं बन पा रहा था। क्या कहे वो! और उससे से भी बड़ा कि अब क्यों कहे? लेकिन अब कहना तो था ही।
- “था नहीं, लेकिन अब है।” उसने धीरे से कहा। “विश्वास कीजिये मैंने कभी नहीं चाहा था कि आपको यह सब कहूंगी। लेकिन शायद मेरी भावनाओं ने विद्रोह कर दिया।”
- “विद्रोह एक सीमा तक ही उचित है मिली। तुम बड़ी हो गई। तुम्हें अब सोच-समझ कर बोलना चाहिए।” उनके स्वर में नाराजगी थी।
मीनल तड़प गई।
- “क्या सीमा है आपकी सोचने-समझने की हेमंत? अपनी भावनों को कुचल देना? लगातार उन्हें झुठलाए रखना? लेकिन कब तक? कोई सीमा तो होगी? और शायद मेरी सीमा अब समाप्त हो चुकी है। अगर आप नहीं सुन सकते तो चले जाइए। लेकिन जाने से पहले यह सुनते जाइए कि आज जो मेरे नाम के साथ यह दूसरे-तीसरे का नाम जुड़ता है तो वो सिर्फ आपके कारण। आपने अगर चाहा होता तो ऐसा नहीं होता। आप जो मुझे पाई-पाई, पूर्जा-पूर्जा समझने की बात करते हैं न, एकदम नहीं समझते। आपने तो मेरे इस नाइन-ओ-क्लॉक के लगाने को भी नहीं समझा। आप जानते हैं मैंने इसे क्यों लगाया? क्योंकि मैंने इसके माध्यम से खुद को आपको समझाना चाहा था। लेकिन आपके लिए तो यह भी मिली का बचपना मात्र था। आपने यह कभी नहीं देखा कि दिन भर आफिस की फाइलों में सर खपाने वाली मीनल, घर में भी अपने कमरे में बंद रहने वाली मीनल आपकी आने पर किस तरह अपने आप से मुक्त हो कर बाहर निकल आती है। आपके आने में देर होने पर किस तरह सारी गंभीरता और स्थिरता की दीवार भेद कर गेट पर खड़ी हो जाती है। ऐसा क्यों हेमंत?” मीनल की सांसें तेज हो गई थीं। लेकिन वह रुकी नहीं। शायद रुक ही नहीं सकती थी। “आप तो कहते हैं कि आप मुझे अच्छी तरह समझते हैं, तो क्या जान-बूझ कर ऐसा करते हैं? आप चुप क्यों हैं? मैं जानती हूं कि आप कुछ नहीं कहेंगे। क्योंकि आपने तो अपने आप को सूरज बना लिया है जिसे देख कर न जाने कितने फूल खिलते हैं। आप किस-किस की चिंता करेंगे? जानते हैं हेमंत, कुछ फूल ऐसे होते हैं जो सूरज के उगने पर खिलते हैं और डूबने पर बंद हो जाते हैं। लेकिन हेमंत यह जो नाइन-ओ-क्लॉक का फूल होता है न, सूरज के डूबने पर बंद ही नहीं होता सूख कर गिर जाता है। किसी दिन यह पौधा ही सूख गया तब? तब भी क्या आप ऐसे ही न्यूट्रल बने रहेंगे हेमंत?” मीनल की छाती में ज्वार सा उमड़ आया। “आप हमेशा कहते हैं न हेमंत कि तुम्हारा दिल बहुत बेकार है, उसका ऑपरेशन कर के फेंक दो कहीं। तो मैं तो यह नहीं कर सकती हेमंत लेकिन आप तो ऑपरेशन करते हैं न, आप ही अपने हाथों इसे निकाल दीजिए। मैं उफ भी नहीं करूंगी… खुश होऊंगी कि आपके हाथों ही…। ”उसने सोफे पर सर रख दिया और फूट कर रो पड़ी। आज के पहले हेमंत कभी इतने पराये नहीं लगे थे।
अचानक उसके सर पर एक स्पर्श ठहर गया। हेमंत ने ठोड़ी (ठुड्डी) पकड़ कर उसका चेहरा उठाया और दो अंगारे उसके होठों पर ठहर गए। मीनल चौंक उठी फिर उसकी पलकें मुंदती चली गईं। उसके कलेजे में जमी सारी पीड़ा, सारी अवहेलना उन अंगारों की लपट में स्वाहा हो रहे थे। वह आत्मविस्मृति में डूब गई।
घड़ी की टन-टन ने दोनों की तंद्रा भंग की। हेमंत आहिस्ता से अलग हो गए। दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे फिर हेमंत ने सर झुका लिया। चुप्पी का एक छोटा-सा टुकड़ा दोनों के बीच आ कर ठहर गया। कुछ देर के बाद हेमंत ने एक लम्बी सांस ली और खड़े हो गए। मीनल को अपनी सांस रुकती-सी लगी। उसने उनका हाथ पकड़ना चाहा लेकिन हेमंत दरवाजे की बढ़ चुके थे।
- “बंद कर लो मिली।” उन्होंने अहिस्ता से कहा। ‘नहीं, मत जाइए’ मीनल ने चीखना चाहा लेकिन उसने कहा - “फिर कब आएंगे?” और अपनी आवाज की स्थिरता पर खुद चौंक पडी |
- “कुछ कह नहीं सकता। शायद अब ना आऊं।’ उन्होंने किवाड़ कुरेदते हुए कहा।
- “क्यों? अपराधबोध हो रहा है?” मीनल का स्वर तीखा था।
- “शायद।” हेमंत ने पल भर के बाद कहा।
- “क्यों?” उसकी छाती में हाहाकार उमड़ आया। “आपने कोई अपराध नहीं किया है। आपको मेरी हर आवश्यकता पूरी करने की आदत है और आपने वही तो किया है।”
- “ये सब कोरे तर्क हैं मिली। ये मुझे मेरे अपराध से मुक्ति नहीं दे सकेंगे।” हेमंत ने थकी आवाज में कहा।
- “सिर्फ अपने लिए सोचा आपने? और मैं? मेरा क्या होगा?” मीनल ने कहा और अपनी फरियाद करती आवाज से खुद ही नाराज हो गई।
- “कुछ ख़ास नहीं। बस जो थोड़ी देर के लिए तुम ज़िंदा हो जाती हो वह नहीं हो पाएगा। उन्होंने शांति से कहा।
- “निष्ठुर!” मीनल ने तड़प कर कहा।
- “निष्ठुर?” हेमंत दरवाजे से टेक लगा कर खड़े हो गए। “अगर मैं निष्ठुर होता तो आज यह सब नहीं होता। मैं जो तुम्हें कहता रहा रहा हूं कि मैं तुम्हें पाई-पाई, पूर्जा-पूर्जा समझता हूं, कभी ग़लत नहीं कहा। मैंने तुम्हें उस रोज भी समझा था जब मैंने तुम्हें पहली बार मीनू की जगह मिली कह कहा था। उस दिन भी जब तुम मेरे साथ फिल्म देखने गई थी और सारे समय मेरे कंधे पर सर रख कर रोती रही थी और तुम्हारी आखों की भाषा को उस दिन भी पढ़ा था जब तुमने मुझे हेमंत भाई की जगह सिर्फ हेमंत कहना शुरू किया था। मैंने सोचा था कि जब तुम बड़ी हो जाओगी, तुम्हारी अलग एक दुनिया होगी तो तुम्हारी भावनाएं किसी और तरफ मुड़ जाएंगी, लेकिन यह मेरी भूल थी। तुम मुझे और कस कर पकड़ती चली गई। तुम पूछोगी मिली कि जब ऐसा नहीं हुआ तो मैंने उस वक्त क्यों नहीं आना बंद किया! तो मैंने चाहा था मिली, बहुत चाहा था। चाहा था कि तुम्हें समझाऊं कि तुम जो सोच रही हो वह नहीं संभव है। लेकिन मैं कह नहीं पाया। मुझे पता ही नहीं चला कि कब तुम्हारी प्रतीक्षा भरी आखों और मुग्ध दृष्टि ने मुझे बांध लिया। जब पता चला तो देर हो चुकी थी। मैं अपने आप को रोकने की कोशिश करता और एक छटपटाहट-सी उठती जो मुझे खींच कर यहां ले आती। मैं तुम्हें देखना चाहता था, तुमसे बातें करना चाहता था, तुम्हारी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को तुम्हारे बिना कहे पूरी करने पर तुम्हारी चमत्कृत आंखों को देख कर खुश होना चाहता था।” हेमंत हांफ गए और मीनल की सांस रुकी हुई थी। वह कहना चाहती थी कि ‘यह सब कभी कहा क्यों नहीं, और कह भी रहे हैं तो अब क्यों कह रहे हैं?’ लेकिन बस फटी-फटी आखों से उन्हें देखती रही। लेकिन हेमंत समझ गए थे। “तुम्हें याद है मिली, मेरी शादी तय होने पर तुमने कहा था कि मेडिकल कॉलेज में कोई लड़की नहीं पसंद आई जो आप अरेंज मैरेज कर रहे हैं? मैंने कहना चाहा था मिली कि मुझे तुम पसंद हो लेकिन तुमसे मैं शादी कर नहीं सकता क्योंकि इस परिवार ने मुझे अपने दूसरे बेटे की तरह अपनाया है। यह उनके उस विश्वास की ह्त्या होती जो उन्होंने मुझे सौंपी है। और मैं यह नहीं कर सकता था। लेकिन मैं तुम्हें भी नहीं छोड़ सका। सोचा था तुम्हें कभी अपनी भावनाओं का पता नहीं लगने दूंगा लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था। हेमंत के मुंह से आह निकल गई। मीनल स्तब्ध बैठी पथराई आखों से न जाने कहां देख रही थी। दोनों अपने-आप में कुछ देर यूं ही खोये रहे फिर एक छोटी-सी सांस के साथ हेमंत ने कहा “मैं जा रहा हूं मिली। यह मत पूछना कि मैं अब कब आऊंगा। क्योंकि मुझे अभी इसका उत्तर खुद नहीं पता है। अभी बस मैं इतना जानता हूं कि अभी मेरे आने का मतलब है अपने सीने पर पड़े इस बोझ को और बड़ा कर लेना। मैं तुमसे माफी नहीं मागूंगा मिली क्योंकि मैं अपराधी हूं तुम्हारे जीवन में आने और बिना तुम्हारी मर्जी के जाने का, लेकिन मैं तुमसे यह भी नहीं छुपाऊँगा कि इस पीड़ा में एक सुख भी है। उस सच के स्वीकार का जिसे मैंने इतने दिनों से छुपाया हुआ था।” हेमंत चुप हो गए। “बंद कर लो मिली।” उन्होंने एक पल के बाद कहा और उसे देखे बिना बाहर निकल गए। आंखों से उनके ओझल होने पर मीनल की चेतना अचानक लौटी। सारी शक्ति बटोर कर वह दरवाजे तक आई | हेमंत लॉन पार कर रहे थे। गेट के पास रुक कर उन्होंने चांदनी में चमक रहे नाइन-ओ-क्लॉक के फूल को देखा, एक क्षण के लिए उस पर झुके फिर एकाएक सीधे हो कर गेट की सांकल खोलने लगे। मीनल को अपनी सहनशक्ति टूटती-सी लगी। वह दौड़ती हुई आई और नाइन-ओ-क्लॉक के गमले को उठा कर जितनी दूर फेंक सकती थी फेंक दिया और बुरी तरह हांफने लगी। हेमंत चुपचाप उसे देखते रहे। “अच्छा किया तुमने।” उन्होंने धीरे से कहा और एकबार उसके माथे पे हाथ रख कर गेट से बाहर हो गए। मीनल ने चाहा कि हमेशा की तरह उनकी कार की दूर होती बैक लाइट अंत तक देखे लेकिन उसके पैरों में खड़े रहने की शक्ति नहीं रही थी। वह थरथरा कर वहीं बैठ गई।
-डॉ॰ अर्चना सिन्हा