Monday, January 6, 2020

एक गीत सुनते हुए

                    आज सुबह-सुबह 'विविध भारती' से 'भूले बिसरे गीत' कार्यक्रम में एक गाना बजा - कन्हईया जादू कर गयो हाय क्या करूँ - और मैं अखबार पकड़े-पकड़े ही रेडिओ के पास आ गयी | यह गाना कोई बहुत मन भावन नहीं लगा लेकिन इस गाने को सुनने की मेरी चिर संचित अभिलाषा अवश्य पूरी हो गयी | यह वह गाना था जिसने मुझे अपने बड़े हो जाने का अहसास कराया था | मेरे जीवन में मेरे ऊपर की हुयी पहली फब्ती, पहली टोंटिंग |
                  बारह साल की थी मैं स्कूल जा रही थी या स्कूल से आ रही थी, यह अब याद नहीं है | भईया साथ में था लेकिन साथ चलते हुए एक क़दम आगे हो गया था | यूँ ही इधर-उधर देखते हुये, बिना किसी प्रयोजन के मेरी दृष्टि सड़क के किनारे अपने मित्र - या जो भी हो - से बातीं कर रहे एक लड़के पर पड़ी और मुझसे आँखें मिलते ही उसने दूसरे लड़के से बातें करना छोड़ कर यही  गाना गया था -'कन्हईया जादू कर गयो, हाय क्या करूँ!"
                  ऐसा स्मरण नहीं कि मुझे कोई 'थ्रिल' महसूस हुआ था | निश्चित रूप से -'इस तरह की बातें बहुत गन्दी चीज हैं और अच्छी लड़कियाँ इस तरह की बातों का बुरा मानती हैं' की पिलायी हुई जन्मघुट्टी का असर रहा होगा | तो मुझे पूरा विश्वास है कि मुझे बुरा ही लगा होगा, लेकिन यह बात मैंने भईया को नहीं बतायी | यह वो पहली चीज या घटना थी जो मैंने भईया से छुपायी थी |
                  जिन्दगी आगे बढ़ गयी, उम्र भी निकल गयी लेकिन मेरी स्मृति में यह गाना  कहीं सुरक्षित रह गया था | शायद अपने बड़े हो जाने की यही  पहली अनुभूति बरसों-बरस बाद जब मैं कविता 'लड़की जो बड़ी हो गयी' लिख रही थी तो उसकी पहली दो पंक्तियों में छलक आयी थी |

    
         
        

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