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Sunday, December 1, 2019

लड़की जो बड़ी हो गयी

लड़की जो बड़ी हो गयी है 
घबरा के खींच दिया उसने 
खिड़की का पर्दा | 
गली से गुजरते एक लड़के ने
बजायी थी सीटी 
उसे देख कर |
बचा कर माँ की नज़र
उसने चुपके से देखा आईना 
और सँवार लिये अपने बाल!

लड़की जो बड़ी हो गयी है 
डाल दी है उसने
दूध की सारी मलाई 
अपने भाई के ग्लास में 
और रख दी है 
अपने हिस्से की सारी गुझिया 
उसके लिए |
कुछ दिन और 
माँ निश्चिन्त रहेगी 
भाई के नाश्ते की फिक्र से |

लड़की जो बड़ी हो गयी है
सिलवा लिया है उसने 
माँ की एक साड़ी का लहंगा 
इस बार के त्योहार में 
और ले आयी है 
अपने कपड़ों के पैसों से 
पिता के जूते और 
भाई के लिये एक जीन्स |
पोछ कर अपनी हथेलियों से 
माँ की आँखों में 
उतर आये आंसुओं को 
मुस्कुरा रही है 
उसके गले में बाहें डाल कर |

लड़की जो बड़ी हो गयी है 
देखने लगी है सपने 
बादलों के पर बने एक महल के 
महल के दरवाजे पर खड़े 
एक राजकुमार के 
और अनजाने में ही 
अपने होंठो पर उतरी 
मुस्कान से चौंक कर 
देखने लगती है चारों और,
और देख कर माँ के चेहरे पर 
चिंता की लकीरें 
सहम जाती है भीतर से |

लड़की जो बड़ी हो गयी है
पढ़ ली है उसने 
पिता के चेहरे पर छायी 
विवशता की लकीरें 
देखी है माँ की आँखों की कातरता |
निकाला है अपनी किताबों के बीच से 
एक सूखा गुलाब!
फेंक नहीं पायी है,
रख दिया है उसे 
किताबों की आलमारी में 
पीछे कहीं छुपा कर |
पहन कर साड़ी 
उठा के हाथों में चाय की ट्रे 
मन-मन भर के पाँव रखती 
जा रही है 
बाहर वाले कमरे की और |
लड़की जो .......|  


   

Sunday, November 10, 2019

एक शाम

मुझे याद है वो शाम,
जब शाम का धुंधलका
खिड़की के बाहर
धीरे धीरे फ़ैल रहा था और
आकाश से कुहासे बरस रहे थे।
तुम बिस्तर पर लेटे थे
और मैं तुम्हारे पैरों के पास बैठी थी।
जाने कब बाहर फ़ैल रहा धुंधलका
तुम्हारे चहरे पर उतर आया,
और कमरे के गहराते अंधेरे में मैंने
तुम्हारी लम्बी पलकों पर
कुहासे की बुँदे देखी।
अनायास ही मेरे हाथ उठे ,
मैं पोंछ दूँ तुम्हारी पलकें।
लेकिन, तुम्हारा चेहरा मुझसे दूर था
और मेरी बाहें छोटी।
तुमने सर नहीं झुकाया,
और मैं?
मैं तो तुम्हारे पैरों के पास बैठी थी।

--तब की, जब मैं अठारह साल की थी।