मिताली को विदा कर जिया फिर से उसी कुर्सी पर बैठ गई जिसपे
बैठ के वह उससे बातें कर रही थी| उसके दिमाग में मिताली की
कही बातें गूँज रही थीं “उनको तो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा, आप जरूर तरोताजा हो जायेंगी”|- अपने लिए, सिर्फ अपने लिए तीन
दिन| मात्र तीन दिन! क्या ऐसा हो सकता है? क्या वो सचमुच ऐसा कर सकती है? घर में तो बताना ही पड़ेगा| घर में सबको मालूम है, अगले रविवार से, यानी मात्र पाँच दिन के बाद से सर्दी की छुट्टियाँ शुरू
होने वाली हैं| यह वो पहले ही बता चुकी है| सो अब झूठ भी नहीं बोल सकती| और ऐसे वही झूठ बोलना ठीक होगा भी नहीं| कभी भी, किसी तरह भी बात खुल गई तो बहुत बुरा हो जायेगा|- जिया व्यग्रता में उठ कर उस छोटे से कमरे में टहलने लगी|- क्या शर्मा जी तैयार होंगे इसके लिए! सिर्फ वही क्यों!
बच्चों को भी बुरा लगेगा| दीपू तो खैर अभी नहीं लौटा
है, लेकिन नीपू तो इंतजार कर रही होगी कि कब माँ घर लौटे कि कामवाली के हाथ के
खाने से मुक्ति मिले| तो फिर? क्या करे वो? लौट जाये चुपचाप? कह दे मिताली से, वह नहीं जा सकती उसके साथ| लेकिन यह तो वह उससे पहले ही कह चुकी है और मिताली ने इसका उत्तर बहुत सहज
ढंग से दिया था- “अगर इतने दिन वो लोग आपके बिना रह सकते हैं तो तीन दिन और रह
लेंगे|उनको तो कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ेगा आप तरोताजा हो
जायेंगी|” तो क्या वो साफ-साफ कह दे शर्मा जी से कि वह
तीन दिन के बाद आयेगी! वह मिताली के साथ राजगीर जा रही है शरत महोत्सव में| क्या-क्या बताया था मिताली ने? हेमा मालिनी - अपनी बेटियों के साथ, पंडित शिव प्रसाद शर्मा, मालिनी अवस्थी, और भी बहुत सारे नामचीन कलाकार| कार्यक्रम तो सात दिन का है लेकिन मिताली तीन दिन के लिए
ही जा रही है उसे कहीं से पास मिल गया है और एक पास पर दो आदमी जा सकते हैं| सो टिकट का भी पैसा नहीं लगना है| रहने और खाने में जो खर्च हो| दिन भर राजगीर की पहाड़ियों में भटकेगी और रात में
प्रोग्राम देखेगी| क्या वो कह सकेगी इतना सब शर्मा जी से? कह सकेगी कि वह थोड़े से पैसे अपनी इच्छा पूर्ती के किये
खर्च करना चाहती है| है उसके अन्दर इतना साहस? साहस? अरे हाँ, साहस! उसने तो कभी सोचा ही नहीं कि कभी किसी
साहस की भी जरूरत पड़ती है| वह भी अपनी किसी इच्छा के
लिए|
और
जिया के सोचने की दिशा बदल गई|- साहस! इसकी तो कभी जरूरत
ही नहीं पड़ी| उसे तो यही पता था कि साहस की जरूरत पड़ती है जब
कुछ अनैतिक हो रहा हो, सम्मान के विरुद्ध हो रहा
हो तो उसका विरोध करने के लिए| ऐसा कभी कुछ हुआ नहीं| और अपनी इच्छा को मनवाने के लिए भी साहस चाहिए होता है, इसका तो कभी ख्याल भी नहीं आया| एक सामान्य विभाग के क्लर्क की तीसरी बेटी| बेटे की आशा में लाई हुई| प्रिया, रिया और फिर जिया| यह तो भगवान् की कृपा थी कि उसके बाद दीपक का जन्म हो गया
तो तीनो बहनें ठीक-ठाक पल गयीं| नहीं तो अगर चौथी बार भी
लड़की हो जाती तो कितनी तल्ख़ हो जाती जिंदगी, उनकी भी और उनकी
माँ की भी| तो फिर ऐसे में कहाँ संभावना बचती थी अपनी
इच्छाओं के लिए कुछ सोचने और कहने की|
जिया
को अपनी अब तक की बीती जिन्दगी याद आ गई| मैट्रिक में बहुत
अच्छे मार्क्स थे उसके| उसे आसानी से साइंस मिल
रहा था| उसने माँ से पूछा था तो माँ ने कहा था, “क्या करोगी साइंस ले कर? तुमको डाक्टर इंजिनियर बनाने की औकात तो है नहीं हमारी| सिर्फ पढ़ना रहता तो कोई बात भी थी| शादी भी तो करनी है| बाकि दोनों भी
आर्ट्स पढ़ रही हैं, तुम भी वही पढ़ लो|” बस| यह पहली और आखरी इच्छा थी
जो उसने सिर्फ कही भर थी| फिर कभी कुछ नहीं कहा| वह तो बी. ए. पास कर के बैठी हुई थी शादी की प्रतीक्षा में| लेकिन दो-दो बेटियों का ब्याह कर चुके पिताजी को उसके लिए
लड़का मिलने में दिक्कत हो रही थी| कहीं दहेज़ के पैसे पसंद
नहीं आते और कहीं वह पसंद नहीं आती| इसी बीच मामाजी ने
सुझाया कि बी.एड. करवा दीजिये| कहीं टीचर में लग गई तो सहुलियत
होगी| आज कल लोग नौकरी वाली लड़की को पसंद करते हैं| सो उसने बी. एड. कर लिया| लेकिन नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ी| मत्स्य पालन और
संरक्षण विभाग में क्लर्क आशुतोष शर्मा के परिवार वालों ने उसे पसंद कर लिया और
उसकी शादी हो गयी|
जिया को अपनी शादी-शुदा जिन्दगी के आरम्भ
के दिन याद आये| सहज सरल जिन्दगी| कुछ भी ऐसा नहीं जिसके लिए कुछ सोचना पड़े| ननद
ब्याही हुई थी और सास से कभी उसकी कोई अनबन नहीं हुई| शायद ससुराल को अपना घर समझने
के उसके संस्कार थे जो वहाँ के सुख दुःख वो सहजता से झेल गयी थी| - जिया ने सोचा|
सास की सेवा अपना धर्म समझना और मायके आई हुई ननद को मेहमान मान कर स्वागत करना|
कहीं कोई विरोध नहीं| और जब विरोध ही नहीं था तो किसी साहस के प्रदर्शन की आवश्यकता
भी नहीं|
हाँ,
साहस की आवश्यकता पड़ी थी| जब शादी के आठ साल बाद शर्मा जी सस्पेंड हो गये थे| गबन
के आरोप में| घर में तंगी होने लगी थी| और तब जिया को अपनी बी.एड. की डिग्री याद आयी
थी| अखबार में इस स्कूल में टीचर की जरूरत का विज्ञापन देख के| कितना डरते-डरते
जिया ने पूछा था शर्मा जी से अप्लाई करने के लिए! कहीं उन्हें बुरा ना लगे| उन्हें
अपने अहंकार पर चोट ना महसूस हो| जब कि वह परिवार की बेहतरी के लिए ही था| कहने से
पहले अपना वो धड़-धड़ करता दिल जिया को याद आया| याद आयी कि कहने के लिए तो उसने तब
भी सोचा था जब हेड क्लर्क का प्रमोशन पाने के बाद शर्मा जी कुछ ज्यादा ही सुख
सुविधा जुटाने लगे थे| लेकिन सोच कर ही रह गयी थी| कुछ तो अपने आदर और खुशी के
माहौल के नष्ट होने के भय से जो उसके ब्याह हो के आने के दूसरे ही महीने में शर्मा
जी के प्रमोशन से हुआ था कुछ शर्मा जे की बुद्धि पर भरोसा कर के| काश उस समय यह
कहने का साहस कर पायी होती कि मत नाजायज किजिये तो शायद मान जाते शर्मा जी| नहीं
होना पड़ता सस्पेंड| ‘लेकिन तब क्या मैं नौकरी कर पाती! इस नए जीवन को जान पाती! तो
क्या मैं शर्मा जी के सस्पेंड होने को अपने लिए अच्छा मान रही हूँ?’ जिया ने सहम
कर सोचा| ‘लेकिन यह तो मैं अब सोच रही हूँ ना| तब तो नहीं सोचा था| तब तो यह नौकरी
सिर्फ मेरा कर्तव्य थी|’ जिया को नौकरी के आरम्भ के दिन याद आये| सब कुछ जल्दी-जल्दी
निबटा कर दौड़ते-भागते स्कूल पहुँचना और जरा सी देर होने पर प्रिंसिपल की अप्रसन्न
मुद्रा और कभी-कभी फटकार भी झेलना| फिर लौट कर कपड़ा बदल कर सीधे रसोई में घुसना|
शुरुआत के डेढ़ दो साल कितने कठिन थे! जिया ने लम्बी साँस ली|
सस्पेंशन
ख़त्म होने में लगभग दो साल लग गए थे, उस पर शर्मा जी की अवनति कर दी गई थी| वो फिर
से क्लर्क के पद पर आ गये थे तो घर में पैसों की आवश्यकता तो थी ही, सो जिया को
नौकरी छोड़ने के लिए नहीं कहा गया| हाँ, उसकी मदद के लिए कामवाली जरूर रख दी गई थी|
बस! जिया को अपने जीवन में कोई और अंतर महसूस नहीं हुआ था| उसने कभी सोचा भी नहीं|
पति, बच्चों, गृहस्थी के अतिरिक्त अपनी भी कोई जिन्दगी होती है, यह तो कभी जाना ही
नहीं| जानती भी नहीं अगर उसका यहाँ ट्रांसफर नहीं हो जाता| अगर वह मिताली से नहीं मिलती|
मिताली, जो
अपनी किसी भी आवश्यकता के लिए, अपने निर्णयों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं थी| जो
तीस वर्ष की हो जाने पर भी अविवाहित थी| अपनी माँ के साथ अकेली रहती थी| जवान-जहान
लड़की, एक बूढ़ी माँ के साथ बिना किसी पुरुष की उपस्थिति के सुरक्षा कवच के| जो अपनी
छुट्टियाँ कपड़े धो कर और सो कर नहीं काटती| स्कूल के पढ़ाई में कमज़ोर बच्चों को घर बुला
कर पढ़ाती| और कभी-कभी आस पास के टोले में जा कर बच्चो को और उनके परिवार वालों को
शिक्षा का महत्व समझाती| स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती| जो टी.वी. सीरियल देखने
की जगह किताबें पढ़ना पसंद करती| जिया को सबसे पहले स्कूल के बच्चों के लिए मिताली
की मेहनत ने आकर्षित किया था| वह बड़ी लगन से बच्चों को पढ़ाती थी| ना सिर्फ पढ़ाती
बल्कि आगे बढ़ने और अच्छा करने के लिए भी प्रेरित करती| लेकिन उसकी रचनात्मकता का एहसास
जिया को तब हुआ था जब वसंत पंचमी के अवसर पर उसने सीमित साधनों और अनगढ़ प्रतिभाओं
वाले बच्चों से अच्छे कार्यक्रम प्रस्तुत करवाए थे| उसकी मेहनत और सोच, दोनों ही
उसकी प्रतिभा को दर्शा रहे थे| और शायद यहीं से जिया खाली समय में उससे ज्यादा
बातें करने लगी थी| जिया का स्वयं इस पर ध्यान नहीं गया था| वो तो एक दिन गुप्ता
जी ने किसी बात पर कहा कि “मैडम तो बस मिताली जी से ही बात करती हैं, और किसी पर
तो उनका ध्यान ही नहीं जाता”, तब जिया को लगा था कि वो सचमुच सबसे ज्यादा मिताली
से ही बातें करती है| ऐसा क्यों? जिया सोच में पड़ गयी थी| क्या आकर्षित करता है
उसे मिताली में? उस वक्त जिया इसे नहीं समझ सकी थी| उसने इसे एक भिन्न प्रकार के
व्यक्तित्व के प्रति, कुछ अच्छा करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के प्रति अपना
सम्मान भाव मान लिया था| लेकिन अब मिताली के साथ दो साल गुजार चुकी जिया इसे समझ रही
है| उसने उसके इस कस्बे में स्थानांतरित हो कर आने के परिवर्तन को, इस छोटे से स्कूल
की प्रिंसिपल होने की खुशी को एक उबाऊँ दिनचर्या बनने से बचाया था| मिताली ने उसका
खुद से परिचय करवाया था|
जिया को
याद आयी, जब पहली बार मिताली ने उसे ए.टी.एम. से पैसे निकालना बताया था| इसके पहले
तो शर्मा जी ही पैसे निकाला करते थे| न उसने कभी पूछा कि कैसे निकालते हैं, ना
उन्होंने कभी सिखने के लिए कहा| जरूरत ही नहीं थी| यहाँ आने के बाद जब पैसों की
जरूरत पड़ी थी तो उसने चेक से निकाला था| शर्मा जी ने चेक से निकालने की हिदायत दी थी|
ए.टी.एम. से निकालने में कुछ गड़बड़ न हो जाये के डर से| खुद जिया को भी खुद पर भरोसा
नहीं था| वो तो मिताली ने उसे समझाया था कि ए.टी.एम. से पैसे निकालना कोई हव्वा
नहीं है| उसने सब कुछ उससे बोल-बोल कर करवाया था और फिर “अपना पिन नंबर डालिए” कहती हुई अपनी
पीठ उसकी तरफ से लगभग फेर ही ली थी|
“अरे? तुम एकदम से मुड़ क्यों गयी?” जिया थोड़ी हैरानी से
पूछा था|
“नहीं मैम| अपना पिन नंबर किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहिए|” एक व्यवहारिक
ईमानदारी!
और फिर जब जिया ने रविवार के दिन कुछ काम नहीं होने और बोर
होने की बात कही थी, तो मिताली उसे पड़ोस के गाँव में ले गयी थी| जहाँ वह बूढ़े, अधेड़
लोगों को साक्षर बनाने की चेष्टा किया करती थी| अच्छा लगा था जिया को गाँव वालों
की दृष्टी में अपने लिए वो छलकता सम्मान| जो स्कूल के खरीदे हुये सम्मान से बिल्कुल
अलग था|
फिर स्कूल जब सुबह का हो गया था और जिया को
दिन लम्बे और बोझिल लगाने लगे थे तो मिताली उसे इस छोटे से शहर के उस छोटे से
सभागार में ले गई थी जहाँ शहर के थोड़े से बुद्धिजीवी लोग मिलकर नाटक किया करते थे|
तब उसने पहली बार जाना था कि मनोरंजन ऐसे भी होता है| मिताली ने उसे बताया था कि
वह भी दो-तीन नाटकों में भाग ले चुकी है| और फिर जब ऐसे ही एक शाम वह मिताली को
रिहर्सल करते देख रही थी तो उसके मन में ख्याल आया था कि क्या वह यह नहीं कर सकती!
लेकिन उसने इस ख्याल को मन में ही दबा दिया था| कहीं कोई यह ना कहे कि सींगें कटा
कर बछड़ी बन रही है| उसने कल्पना की थी कि अगर वह घर में सबको बताये कि उसकी इच्छा
स्टेज पर आने की है तो कैसी प्रतिक्रिया होगी सबकी| शर्मा जी तो सीधे मना कर देंगे
और बच्चे भी हसेंगे| लौटते समय जब मिताली ने उसके अनमनेपन के लिए पूछा था तो उसने
सर के भारी होने का बहाना बना दिया था| वह जानती थी कि अगर वह अपने मन की इस इच्छा
को उसे बताएगी तो वह निश्चित रूप से उसे अपनी इच्छा पूरी करने के लिए कहेगी| न जाने
कितने तर्क गढ़ लायेगी इसके लिए| और जिया को उसके तर्क अच्छे लगेंगे| फिर उसका मन
उन तर्कों को स्वीकार करना चाहेगा| लेकिन मन के करने से क्या होगा! इसके लिए
हिम्मत चाहिए थी और जिया में इतनी हिम्मत कहाँ थी! ‘तो क्या अब है उसमें हिम्मत?’
जिया उठ कर बैठ गयी|
कमरे
में अन्धेरा घिर आया था| जिया को पता नहीं चला था| उसे आश्चर्य हुआ! ऐसे कैसे
विचारों में गुम हो गयी थी वो! ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था! उसने कमरे में चोरों ओर
नज़र घुमाई| कमरे के अन्दर की सारी आकृतियाँ नीम अँधेरे में धुंधली नजर आ रही थीं|
जैसे झीने काले पर्दे के पीछे छुपा हुआ हो सब कुछ| उसने उठ कर बिजली का स्वीच दबा
दिया| कमरा प्रकाश से नहा गया| क्षण भर के लिए उसकी आँखें चुंधिया गईं, फिर सब कुछ साफ़-साफ़, स्पष्ट
नजर आने लगा| एक ठीक-ठाक कमरा| ना बड़ा, ना छोटा| दरवाजे के बगल में खिड़की, और उससे
लगा एक टेबल और दो कुर्सियाँ| जो खाने और कुछ लिखने- पढ़ने; दोनों के काम आते थे|
टेबल के सामने एक पलंग, पलंग के पीछे कपड़ों की आलमारी, जिसके एक पल्ले में आदम कद
आईना लगा हुआ था| पलंग के सामने बेंत का छोटा सा सोफा जिसका टेबल सोफे के सामने ना
हो कर किनारे खिसकाया हुआ था और जरूरत पड़ने पर बीच में खिसका लिया जाता था| इस कमरे
के बाद एक छोटी-सी रसोई और रसोई के सामने थोड़ी जगह छोड़ कर नहाने का कमरा| कमरे में
पता नहीं किसलिए पीछे भी एक दरवाजा था| जिया ने उस पर एक काठ की आलमारी टांग कर
भगवान जी का स्थान बना दिया था| बस! यही थी जिया के अकेले की गृहस्थी| जहाँ वो दो
सालों से रह रही थी, वापस चले जाने की प्रतीक्षा में| किराए का घर| जहाँ जो समय
काट रही थी अपनी नौकरी का| जिसे वह कभी घर नहीं कहती थी| कमरा कहा करती थी| जो उसे
कभी अपना नहीं लगा| उसका घर तो वहाँ था; जहाँ वह अपने पति, बच्चों और सास के साथ
रहती थी| जहाँ वह माँ थी, पत्नी थी, बहु थी| यहाँ तो सिर्फ जिया रहती है| जो एक
स्कूल की प्रिसिपल है| लेकिन उसका परिचय तो यही है! जिया तो यही है! तो फिर वहाँ
जो रहती है अपने परिवार के साथ; वो जिया कौन है! वह सच है या यह सच है! वह झूठ है
या यह झूठ है! किससे पूछे इसका उत्तर! कहाँ ढूँढे इसका जवाब! जिया एक बार फिर पलंग पर बैठ गयी| हताशा
में अपने सर को अपने हाथों में थामें हुए|
टेबल पर
रखी अलार्म घड़ी की कीड़ीक-कीड़ीक ने उसका ध्यान खींचा| घड़ी की सेकेण्ड की सूई एक ही
जगह पर धीरे-धीरे झूल रही थी| उसकी बैट्री खत्म हो गयी थी| स्कूल से लौटते हुए वह
बैट्री लेती आयी थी लेकिन लगाना भूल गयी थी| सुबह वह अभ्यासवश ही उठ गयी थी|
अलार्म तो बजा ही नहीं था| बैट्री की बची-खुची ताकत पर सेकेण्ड की सूई धीरे-धीरे हिल
रही थी| जिया के होठों पर एक मुस्कान आ गयी| ‘कितनी देर से वह भी झूल रही है ना एक
ही स्थान पर|’
जिया ने
उठ कर दरवाजा खोला और बाहर छोटे से बरामदे में आ गयी| ‘तो क्या करना है! जाना है
राजगीर या नहीं जाना है!’ बरामदे के हल्की रौशनी में टहलते हुए जिया सोचने लगी|
हाँ यह सच है कि घर में सब उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं| वह भी घर लौटने की
प्रतीक्षा कर रही है| उसकी सारी खुशियाँ तो वहीं हैं| लेकिन यहाँ भी उसकी एक छोटी
सी खुशी है| और दोनों जगह जीने वाली जिया भी एक ही है| वह सच और यह झूठ नहीं है|
और ना ही यह सच और वह झूठ है| यह तो जिया के ही दो पहलू हैं| और दोनों एक दूसरे के
पूरक हैं| कोई किसी से कम नहीं है| यह तो बस ‘जीवन शान्ति पूर्वक कट जाए’ के
संस्कार थे जिसके कारण वह इस जीवन को विवशतावश ओढ़ा हुआ मानती रही थी| तो अब वक्त आ
गया है कि इस जीवन को भी अपना मान लिया जाये| भागे नहीं इससे| जिये इसमें| खुशी से
जिये| हाँ, घर में सब को थोड़ा आश्चर्य् होगा| हो सकता है बुरा भी लगे सबको| बच्चों
को लगे कि माँ हमलोगों के बिना कहीं कैसे जा सकती है| शायद शर्मा जी को भी ऐसा ही
लगे| उन्हें यह भी लग सकता है कि जिया ने उनसे पूछे बिना यह निर्णय कैसे कर लिया!
शायद उन्हें यह अपना अपमान भी लगे| तो समझाना होगा उन्हें कि जब वो किसी बात का
निर्णय स्वयं लेते हैं तो उनका अभिप्राय कहीं से जिया के अपमान का नहीं होता, उसी
तरह जिया के भी किसी बात का स्वयं निर्णय लेने का अर्थ उनका अपमान नहीं है| समझाना
होगा कि हर व्यक्ति अपना एक निज का आकाश चाहता है; जहाँ थोड़ी देर साँस ले कर वह तारो-ताजा
हो ले और एक बार फिर अपने कर्तव्यों और दायित्वों की दुनिया में पूरे उत्साह से जुट
सके| लेकिन इसके लिए उसे अपने प्रति भी कुछ दायित्वों को निभाना होता है| समझाना होगा
सबको| समझ भी जायेंगे सब क्योकि जहाँ प्यार होता है वहाँ समझदारी भी होती है|
जिया ने एक
लम्बी साँस ली| बरामदे की रेलिंग पर रखे गमले में खिले रातरानी के फूलों की खुशबू
ने उसके मन को ताजा कर दिया| उसने स्नेह से फूलों को सहलाया और कमरे में लौट आयी|
कमरे में
फैले प्रकाश ने उसे समय का एहसास कराया| ‘कितना बज गया?’ उसने हड़बड़ा कर घड़ी देखी लेकिन
घड़ी तो बंद थी| वह मोबाईल उठा कर समय देखा| साढ़े आठ बज रहे थे| मोबाईल रखने ही जा
रही थी कि रुक गई और फिर एक क्षण रुक कर मिताली का नंबर दबा दिया| उसे बता दे; वह
जा रही है उसके साथ राजगीर| लेकिन रिंग बजकर बंद हो गया| शायद वह कहीं और थी| कोई
बात नहीं| जिया को पता था उसका नंबर देख कर वह रिंग कर लेगी| घर बात कर ली जाए –
जिया ने सोचा लेकिन फिर मोबाइल रख दिया| वहाँ सूचना नहीं देनी, पूरी बात करनी है|
कल कर लेगी इत्मिनान से| मुड़ने लगी तो नजर सामने बंद घडी पर पड़ी| उसने पलंग पर रखा
बैग उठाया और बैट्री निकाल कर घड़ी में लगाने लगी| मोबाइल में देख कर समय मिला दिया|
रुकी हुई घड़ी चल पड़ी| उसे वापस टेबल पर रख कर जिया रसोई की ओर मुड़ गयी|
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अद्भुत
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